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सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

ग्राम स्वराज्य ही विश्व मंगल का आधार

GandhiJIअब ऐसा स्वीकार किया जाने लगा है कि विश्व में मानवीय मूल्यों के हो रहे ह्रास, नकारात्मक वृत्तियों के विकास का कारण ग्राम संस्कृति और ग्राम की स्वायतता का नष्ट हो जाना ही है। यह बात केवल भारत के संदर्भ में ही नहीं कही जा रही बल्कि इसे पूरे विश्व के संदर्भ में भी कहा जा सकती है। आज यूरोप में इस बात पर सर्वाधिक चिंता व्यक्त की जा रही है कि वहां हिंसा बढ रही है। छोटी उम्र के बच्चे ही अपराध कार्यों में फंस रहे हैं। परिवारों में आपसी रिश्ते टूट रहे हैं जिसके कारण परिवारों के अस्तित्व पर ही संकट की स्थिति आ गई है। भोगवादी प्रवृत्ति बढ रही है तमाम तकनीकी उन्नति के बावजूद व्यक्ति पशुता की ओर जा रहा है। यूरोप में तो नगरीकरण की प्रक्रिया इतनी तेजी से बढी है कि वहां ग्रामों के लोप होने का खतरा पैदा हो गया है। उसके देखा-देखी एशिया के अनेक देशों में भी नगरीकरण की प्रक्रिया ग्रामों को लीद रही है। थाईलैण्ड में तो मानो सारे देश की आबादी राजधानी बेंकॉक में ही सिमटने का प्रयास कर रही है। यही स्थिति मलेशिया की है। अब ये तमाम प्रवृत्तियां भारत में भी दिखाई देने लगी हैं। इसलिए भारत में अनेक प्रबुद्ध लोग देश के सांस्कृतिक भविष्य को लेकर चिंता प्रकट कर रहे है।

यूरोप में ग्राम और परिवार के विघटन व नगरों के असमाजिक जीवन की शुरूआत औद्योगिक क्रान्ति से मानी जा सकती है। इस प्रक्रिया को तेज करने में प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की इन युद्धों से यूरोप के लोगों को जीवन के क्षण भंगुर होने का अहसास बहुत तेजी से हुआ और भय की इस काली छाया में भोग की पाश्विक वृत्तियां जागृत हुईं। औद्योगिकरण की यह प्रक्रिया ज्यों-ज्यों भारत में फैलती गई त्यों-त्यों उससे जुडी तमाम बिमारियों का यहां आना भी स्वाभाविक ही था। कृषि प्रधान आर्थिक व्यवस्था में ग्राम एक ईकाई के रूप में सुरक्षित ही नहीं रहता बल्कि परिवार की संस्था भी अपनी उपयोगिता बनाए रखता है। कृषि आधारित व्यवस्था में संयुक्त परिवार ज्यादा उपयोगी माने जाते हैं और सामाजिक संस्कृति के मूलाधार सुरक्षित रहते हैं। कृषि आर्थिकता में गाय की उपयोगिता सर्वाधिक होती है। यदि इसको और व्यापकता में कहा जाए तो कृषि और पशु परस्पर आधारित है और दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। फिर गाय तो भारत में केवल आर्थिकता से जुडी हुई नहीं है, बल्कि देश के सांस्कृतिक परिवेश में भी उसका गहरा स्थान है। परन्तु जब धीरे-धीरे छोटे किसान समाप्त होने लगे और उनके स्थान पर हजारों एकड के जमींदार या उद्योगपति आ गए तो उन्होंने कृषि करण को ही मशीनों और मजदूरों के प्रयोग से एक बडे उद्योग में ही बदल दिया। इससे कृषि कार्य में से सृजन का आनन्द समाप्त हो गया। गाय और अन्य पशु अनुपयोगी हो गए और गांव की आर्थिकता की रीढ की हड्डी टूट गई। यूरोप में बडे स्तर पर पशु वध शुरू हो गया और भारत में गोवंश की दुर्दशा सबके सामने है। गोग्राम की प्रासांगिता पर प्रश्नचिह्न लग जाने से भारत का मंगल या फिर विश्व मंगल की कल्पना भला कैसे की जा सकती थी?

महात्मा गांधी ने शायद इस स्थिति को बहुत पहले ही पहचान लिया था वे भविष्यद्रष्‍टा थे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में ही हिन्द स्वराज लिख कर इस बात पर जोर देना शुरू कर दिया था कि भविष्य के भारत के विकास का मूलाधार ग्राम स्वराज ही हो सकता है। गऊ के बारे में गांधी की चिंता तो सर्वज्ञात ही है गौरक्षा के लिए वे किसी भी सीमा तक जाने को तैयार थे गांधी के सपनों का भारत वह था जिसमें स्वावलंबी गांव सबसे छोटी ईकाई हो नगरीकरण का गांधी जी विरोध करते थे, यही कारण था कि वे बडी मशीनों के खिलाफ थे। वे जानते थे कि बडी मशीन गांव को खाएगी और नगरों में झुग्गी-झोपडियों का जंगल खडा करेगी गांधी जी का मानना था कि मशीन मानव मंगल के लिए है न के मानव को गुलाम बनाने के लिए। गांधी जी ऐसा मानते थे कि भारत का सांस्कृतिक प्रवाह ग्राम से होकर जाता है। यदि ग्राम उजड गया या फिर स्वावलंबी न रहा तो संस्कृति की यह अविछिन्न धारा अपने आप सूखने लगेगी। दीन-हीन ग्राम या फिर याचक की मुद्रा में खडा ग्राम भारत का आधार नहीं बन सकता। भारत का आधार तो स्वावलंबी ऊर्जा वान ग्राम ही बन सकता है। दुर्भाग्य से गांधी के उत्तराधिकारी पण्डित जवाहर लाल नेहरू की इस ग्राम स्वराज्य में कोई आस्था नहीं थी इसलिए नेहरू ने हिन्द स्वराज को गांधी के सामने ही अप्रासांगिक करार दिया था नेहरू मानते थे आधुनिक युग में जिस मशीनी क्रान्ति की शुरूआत हुई है उसमें ग्राम स्वराज्य की कल्पना करना ही दखियानूसी है। गौरक्षा की बात उनकी ह्ष्टि में मजहबी कट्टरता से ज्यादा कुछ नहीं थी।

लेकिन इसे अजब संयोग मानना होगा कि यूरोप के कई देशों ने तथाकथित आधुनिकता की बिमारियों से छुटकारा पाने के लिए हिन्द स्वराज पर गंभीरता से चर्चा हो रही है। यूरोप में वैकल्पिक अर्थशास्त्र की तलाश में जुटे विद्वानों ने हिन्द स्वराज को विश्व मंगल के लिए प्रासांगिक माना है। यह वर्ष हिन्द स्वराज के सौ साल पूरे होने का वर्ष है। और यह अजीव संयोग है कि इसी वर्ष भारत के लोग देश भर में विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा का आयोजन कर रहे हैं। इस यात्रा का मूलाधार भी ग्राम का स्वराज्य और गौवंश की रक्षा ही है। एक बात और ध्यान में रखनी होगी कि इस यात्रा ने गौ और ग्राम को आधार बनाकर भारत मंगल की कामना नहीं कि है बल्कि विश्व मंगल की कामना की है। यहां एक और मुद्दे पर भी ध्यान देना होगा नए अर्थशास्त्र में बडी मशीन उत्पादन को बढाती है और आधुनिकता की अधकचरी समझ इस उत्पादन के ज्यादा से ज्यादा भोग को ही सुख और मंगल का कारण मानती है। जबकि सुख और मंगल की यह अवधारण वास्तविकता से कोसों दूर है। भोग सुख का एक कारक हो सकता है लेकिन वह एकमात्र कारक नहीं है । सुख के अनेक अन्य कारक भी हैं लेकिन आधुनिक अर्थशास्त्र के विद्वान इन अन्य कारकों का नोटिस लेने के लिए तैयार नहीं है। उनका तर्क यह है कि इन कारकों को किसी भी ढंग से नापा नहीं जा सकता। लेकिन यह तर्क भीतर से खोखला है आप किसी चीज को नाप नहीं सकते इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका अस्तित्व ही नहीं है। यह मनुष्य जीवन की, उसके सुख और मंगल की एक पक्षीय विवेचना है। दीन दयाल उपाध्याय और महात्मा गांधी ही समग्र एकात्म विकास की चर्चा करते थे। उसी से विश्व मंगल की अवधारण उत्पन्न होती है।

आज जबकि पूरा विश्व चौराहे आ खडा हुआ है भौतिक उन्नति ने उसे विनाश के रास्ते पर मोड दिया है। ग्राम का विनाश तो हो ही चुका है अब मानव अपने विनाश की राह पर चल रहा है। ऐसे मौके पर भारत में शुरू होने वाली यह विश्व मंगल गौ ग्राम (यह यात्रा 30 सितम्बर को कुरूक्षेत्र से प्रारम्भ होगी।) यात्रा सम्पूर्ण विश्व में एक नई बहस को जन्म देगी ऐसा माना जा सकता है। ‘चलो ग्राम की ओर’ का यह नारा वास्तव में एक बार फि र मंगलमय, सुख-समृद्धि और सम्पन्न भारत की कामना करता है। इस कामना के दो ही मूल स्तम्भ है गौ और ग्राम और दोनों एक-दूसरे से गर्भनाल से बंधे हुए हैं। पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध में जयप्रकाश नारायण ने समग्र क्रान्ति का उद्धोष किया था उस उद्धोष के चलते सत्ता परिवर्तन तो हुआ लेकिन समग्र क्रान्ति का सपना टूट गया। विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा यह आह्वान भी एक नई क्रान्ति का द्योतक है। परन्तु यह क्रान्ति समग्र क्रान्ति से भी गहरी क्रान्ति होगी। क्योंकि इसमें भारतीय संस्कृति के मूलाधारों को प्रस्थापित करने का प्रयास होगा।

- कुलदीप चंद अग्निहोत्री

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

गाय के गोबर से कागज बनाने में सफलता

भारत में गाय के गोबर से कागज बनाने के शोध् का श्रेय डॉ. अनुराधा नाम की एक युवती को जाता है। अनुराधा विशाखापट्टणम्‌ की रहने वाली हैं। इन दिनों वह राजमुंद्री के एक महाविद्यालय में अध्यापन का काम कर रही है। आंध्र विश्वविद्यालय के प्रोपफेसर पुल्लाराव के मार्गदर्शन में अनुराध ने इकोनॉमिक्स ऑफ एजुकेशन में डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की है। अनुराधा जी का कहना है कि जब विशाखापट्टणम्‌ में उनकी भेंट डॉ. मदनमोहन बजाज से हुई, तो वे गाय के संबंध् में सोचने लगीं। डॉ. बजाज ने अपने शाकाहार संबंधी व्याख्यान में भारतीय गायों की दुर्दशा का अत्यंत ही भावुक शब्दों में वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जब तक गाय के साथ अर्थव्यवस्था नहीं जुड़ती, गाय का देश में उद्धार नहीं हो सकता है।( ---- )छोड़ दिया गया भाग गाय के गोबर में फाइबर होने के कारण डॉ. अनुरोधा ने सोचा कि यह कागज का कच्चा माल हो सकता है। फ़िर क्या था, उन्होंने गाय के गोबर के साथ अन्य रसायन और कुछ दूसरी वस्तुओं का मिश्रण किया। लगातार प्रयोग करने के बाद वे कार्ड बोर्ड बनाने में सफल हो गईं, लेकिन उनका उद्देश्य तो लिखने का कागज बनाना था, इसलिए वह अपने प्रयोग करती रहीं।

पहले पहल कागज टूट जाता था, लेकिन उसे जोड़ने का मार्ग भी उन्होंने खोज लिया। अब बाजार में उपलब्ध् कागज जैसा उनका कागज बनकर तैयार हो गया। अब तक तो वे सारा काम हाथ से कर रही हैं। छोटी-बड़ी मशीनें जुटाकर उसका प्रयोग किया, लेकिन अब वे सोच रही हैं कि उसकी मशीनें मुझे मिल जाएँ, तो उसका उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जा सकता है। अनुराधा का कहना था कि पहला प्रयोग सपफल होते ही नमूना मैंने डॉ. बजाज को भिजवा दिया। डॉ. अनुराधा का कहना है कि यदि काम बड़े पैमाने पर हुआ, तो एक दिन गाय का गोबर सौ रुपये किलो बिकेगा। इस क्रांति के पश्चात्‌ गऊ माता देश की अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बन जाएगी। देश और दुनिया इस उपयोगी पशु को मरते दम तक अपने सीने से लगा कर रखेगी। कागज के लिए जब गोबर का उपयोग होने लगेगा, उस दिन सारा देश कहेगा यह गोबर नहीं वास्तव में गो वर है, जो हमें समृद्ध और संपन्न बनाएगा।
नई दिल्ली से प्रकाशित राजधर्म' के फरवरी 2009 ई. के अंक में प्रकाशित लेख से साभार

बुधवार, 29 सितंबर 2010

भारतीय वैज्ञानिकों के शोधानुसार गौ हत्या से आता है भूकम्प!




रविवार, 06 दिसम्बर 2009
चिड़ावा, 07 दिसम्बर।
विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा के तहत निकाली जा रही तहसील गौ ग्राम यात्रा के दूसरे दिन सोमवार को गोविंदपुरा व मंड्रेला में सभाओं का आयोजन किया गया। गांव गोविंदपुरा में तहसील संयोजक महेंद्र सैनी ने ग्रामीणो को सम्बोधित करते हुए कहा कि गौ हत्या से भूंकप आता है। उन्होंने बताया कि सितम्बर 1994 में सोबियत संघ की ओर से अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया था इसमें भारत के तीन वैज्ञानिको ने भाग लिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. मदनमोहन बजाज, इबाहिम व विजय राज सिंह ने सम्मेलन में शोध पत्र पेश किया। जिसमें साबित किया गया कि एक गौ माता के कटने से 1 हजार 40 मेघावाट से यादा ऊर्जा निकलती है तथा इसी के कारण भूंकप आता है। वैज्ञानिको के इस शोध पत्र को विज्ञान जगत में 20 थ्योरी ऑफ अर्थ व्कैक्स के नाम से जाना जाता है। मंड्रेला में मुख्य वक्ता हरिप्रसाद नरहड़िया ने भी गौ माता के बचाने की अपील करते हुए इस अभियान में सहयोग करने की बात कही। इस दौरान योगानंद आश्रम चिड़ावा के महंत मंगलनाथ महाराज के सानिध्य में गौ की पूजा-अर्चना की गई। इस अवसर पर राजेंद्र टेलर, बजरंग दल के विनोद सैनी, महावीर जादाम, रघुवीर मेहरा, धमेंद्र लाखू सहित ग्रामीणजन उपस्थित थे।
दर्जनभर से अधिक गांवो में किया दौरा: तहसील संयोजक महेंद्र सैनी ने बताया कि यात्रा के दूसरे दिन दर्जनभर से अधिक गांवो में दौरा किया गया। गांव केहरपुरा से आरम्भ होकर गोविंदपुरा, मालूपुरा, मोहनपुरा, कंवरपुरा, बख्तावरपुरा,भामरवासी, अलीपुर, खुडाना, बुडानिया आदि गांवो से होती हुई यात्रा निकली। यात्रा के दौरान गौ सरंक्षण एवं सर्वधन की अपील की गई।
यात्रा का कार्यक्रम: तहसील संयोजक महेंद्र सैनी ने बताया कि आज मंगलवार को डाबड़ी, सैनीपुरा, बजावा, कुलडिया का बास, खुडिया, धूमनसर, झेरली, रायला आदि गांवो में यात्रा जाएंगी। यात्रा के तीसरे दिन का समापन पिलानी में किया जाएगा।

सत्ता का जनविरोधी चरित्र

सत्ता का जनविरोधी चरित्र

काग्रेस सरकार ने माओवादियों के खिलाफ जंग छेड़ दी है जो ठीक ही है चूंकि सत्तारूढ़ पार्टी के लिए घने जंगलों में दबे हुए खनिजों के खनन एवं जलविद्युत के उत्पादन के लिए इन क्षेत्रों को खोलना जरूरी है। सरकार की सोच है कि इन रास्तों से हासिल हुए आर्थिक विकास से सरकार का राजस्व बढ़ेगा, रोजगार गारंटी जैसी जनहितकारी योजनाएं चलाई जा सकेंगी और जनहित हासिल होगा। परंतु सरकार भूल रही है कि विकास की इस प्रक्रिया में वह आदमी पहले ही स्वाह हो जाएगा, जिसके नाम पर ये उद्योग लगाए जा रहे हैं। तथापि सरकार ऐसा सोचती है लेकिन मंत्रियों के निजी स्वार्थ इन्हीं विकास योजनाओं से जुड़े हैं। आश्चर्य की बात यह है कि प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा एवं हिंदू संत समाज द्वारा सरकार की इस सैन्य कार्यवाही का पुरजोर समर्थन किया जा रहा है। वे गरीब की उस आह की अनदेखी कर रहे हैं, जिस कारण उन्होंने ये अस्त्र उठाए हैं। ये विद्वान भूल रहे हैं कि गरीब को इसी प्रकार की त्रास देने के कारण भारत छोटा होता जा रहा है।
आज से पांच हजार वर्ष पूर्व भारत की सिंधु घाटी सभ्यता विश्व में सर्वश्रेष्ठ थी। इस सभ्यता के व्यापारियों का तत्कालीन मिस्त्र और इराक के व्यापार पर दबदबा था। लेखक बीबी राजवंशी के अनुसार पश्चिम एशिया केतमाम शहरों के नाम भारतीय मूल के शब्दों पर आधारित हैं जैसे असुर सेअशुर , अमरावती से अमरा शहर, आर्यमान से इरान, एरावत वन से एरावन, नंदन वन
से नखीचेवन, पुर से पर्शिया इत्यादि। संभव है कि ये नाम भारतीय प्रवासियों द्वारा दिए गए थे। बौद्ध काल में भारत से अनेक भिक्षु विश्वके दूसरे देशों में गए थे, परंतु पिछले हजार वर्षों से भारतीय सभ्यता का लगातार संकुचन हो रहा है। लोधियों के बाद बाबर जैसे योद्धा छोटी सेना के बल पर भारत पर कब्जा करने में सफल हुए। कारण यह दिखता है कि देश के आम आदमी ने घरेलू आतताई शासकों के विरुद्ध विदेशी शासकों का साथ दिया। मीर जाफर जैसे लोगों ने अंग्रेजों की मदद की और उनका शासन स्थापित कराया।
1947 के पहले ही बर्मा, सीलोन, नेपाल और अफगानिस्तान अलग हो चुके थे। 1947 में पाकिस्तान अलग हुआ। मुसलमान भाइयों को हिंदू शासकों के न्याय पर भरोसा नहीं था। तमाम गरीब लोग ईसाई और इस्लाम धर्म को लगातार कबूल कर रहे हैं, चूंकि उन्हें हिंदू समाज में न्याय नहीं मिल रहा है। इसी क्रम में डा. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म को अपनाया था। कुछ वर्ष पूर्व उदयपुर के आदिवासी क्षेत्र में एक युवक से भेंट हुई, जिसने हाल में ही ईसाई धर्म कबूल किया था। वह बीमार पड़ गया था। हिंदू पंडित के पास गया तो उसने पूजा-अर्चना के लिए पैसे मागे। घर के जेवर बेचकर कुछ पैसे दिए परंतु लाभ नहीं हुआ। ईसाई चर्च में गया तो मुफ्त दवा और साथ में दुआ भी मिली और वह स्वस्थ हो गया। डूंगरपुर के आदिवासियों ने बताया कि स्वदेशी हिंदू राजाओं के अत्याचार से बचने के लिए वे अजमेर के ब्रिटिश प्रेजिडेंसी क्षेत्र में भाग कर पनाह लेते थे। आज भी दलित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग अंग्रेजों के शासन को उत्तम मानता है। इस आक्रोश का कारण यह है कि भारतीय शासकों का मूल चरित्र जनविरोधी है। इस चरित्र की पकड़ इतनी गहरी है कि डा. मनमोहन सिंह जैसा ईमानदार व्यक्ति भी इसकी गिरफ्त में आ गया है।

प्रधानमंत्री देश में व्याप्त सरकारी कर्मियों के अत्याचार को रोकने के स्थान पर उसे बढ़ावा दे रहे हैं। नक्सलियों का दावा है कि उनके आंदोलन के कारण तेंदू पत्ता कर्मियों का वेतन 10 रुपये प्रतिदिन से बढ़कर 40 रुपये प्रतिदिन हो गया है। यह कार्य सरकार के लेबर इंसपेक्टर नहीं कर सके थे। इन क्षेत्रों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली कागज पर चल रही है। पुलिस रक्षक के स्थान पर भक्षक बन गई है। भूमि वितरण की गंध भी इधर नहीं पहुंची है। अर्थव्यवस्था के इस जनविरोधी चरित्र को तोड़ने के स्थान पर प्रधानमंत्री इसे जनहितकारी बता कर जनता को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं। पार्टी के युवा नेता दलित की झोंपड़ी में रात बिताते हैं परंतु उसके बंद हुए हथकरघे को चलाने का जतन नहीं करते। गरीब को मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ सुविधाएं उपलब्ध कराने के नाम पर भारी भरकम वेलफेयर माफिया को पोषित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री की इस विकृत विचारधारा को भाजपा ने भी पूर्णतया अपना लिया है। भाजपा शासित राज्यों में संस्कृत भाषा, गोरक्षा, आयुर्वेद जैसे संभ्रात वर्ग के मुद्दों पर
अपने मार्गदर्शकों को भ्रम में डालकर जनविरोधी आर्थिक नीतियों को तेजी से लागू किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड की सरकारें खनन एवं जलविद्युत के नाम पर गरीब को कुचलने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स गठित कर रही हैं। दूसरी पार्टिया भी पीछे नहीं हैं। जनसंकल्प संस्था के अनुसार उत्तरप्रदेश के कौशाबी जिले में बसपा सरकार द्वारा पोषित बालू एवं मछली माफियाओं ने वहां के गरीबों के पारंपरिक खनन एवं मछली पकड़ने के अधिकारों को हड़प लिया है। बंगाल में मार्क्सवादियों ने नंदीग्राम में जनता को इसी प्रकार कुचलने का प्रयास किया है। पिछले हजार वर्षों में पैदा हुआ हमारा गरीब विरोधी चरित्र सर्वव्यापी हो गया है। इस दुरूह परिस्थिति में गरीब द्वारा अस्त्र उठाना एवं माओवादियों को समर्थन देने को अनुचित कैसे ठहराया जा सकता है?
संकेत मिल रहे हैं कि माओवादियों के चीन, पाकिस्तान की आईएसआई एवं दूसरे विदेशी संस्थाओं से संबंध स्थापित हो चुके हैं। देशप्रेमियों का कहना है कि जो भी हो, माओवादियों को बाहरी ताकतों का सहारा नहीं लेना चाहिए। कानूनी तौर पर यह तर्क सही है। परंतु मानवता के स्तर पर देश की सरहद का महत्व नहीं होता है। सच यह है कि हमारे दुश्मन हमारे नेताओं द्वारा गरीबों पर ढाए जा रहे अत्याचार का लाभ उठा रहे हैं जैसा कि कौटिल्य ने सलाह दी थी। अर्थशास्त्र ग्रंथ के सातवें खंड के अध्याय 4 एवं 5 में कौटिल्य लिखते हैं, ‘जब राजा को ज्ञात हो कि दुश्मन के नागरिक सताए जा रहे हैं, उनके साथ दुर्व्यवहार हो रहा है, गरीब परेशान और बिखरे हुए हैंऔर उनसे अपने शासक के त्याग की अपेक्षा की जा सकती है तब दुश्मन पर धावा बोल देना चाहिए। जब लोग गरीबी से त्रस्त होते हैं तो वे लालची हो जाते हैं, जब वे लालची होते हैं तो वे अनमने हो जाते हैं और स्वेच्छा से दुश्मन की तरफ हो जाते हैं अथवा अपने शासक को नष्ट कर डालते हैं। अत:राजा को कोई भी ऐसा कृत्य नहीं करना चाहिए, जिससे जनता में गरीबी, लालच अथवा अनमनापन पैदा हो। यदि यह स्थिति पैदा हो जाए तो तत्काल सुधार करना चाहिए।’

हमारे दुश्मन देख रहे हैं कि भारत की लगभग सभी पार्टिया जनविरोधी हो चली हैं। जनता त्रस्त है। जैसे पूर्व में देश के आम आदमी से बाबर आदि को समर्थन मिला था, वैसा ही आज विदेश-पोषित क्रांतिकारियों एवं मिशनरियों को मिल रहा है। विशेष दुर्भाग्य यह है कि विपक्षी पार्टियों और धर्मगुरुओं द्वारा गरीब के दर्द को दूर करने की बात नहीं उठाई जा रही है। केवल गरीब के दर्द को आवाज दे रहे माओवादी संगठनों के विदेशी संबंधों की भ‌र्त्सना की जा रही है। इस तरह तो सौ साल में ही भारतीय संस्कृति लुप्त हो जाएगी। हमें गरीबों के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने के बजाए पिछले एक हजार वर्षों में गरीबों पर ढाए गए अत्याचारों का प्रायश्चित करना चाहिए।

रासायनिक खेती से उपज बढ़ने का झूठ !

रासायनिक खेती से उपज बढ़ने का झूठ !

56 से घटकर 30 क्विंटल रह गई

यानि ये दावे पूरी तरह गलत हैं, झूठे हैं कि उपज बढ़ाने के लिए रासायनिक खेती की जरूरत है। सच तो यह है कि रासायनिक खेती से उपज घट रही है और देश में अनाज की कमी बढ़ रही है जबकि खेती को घाटे का सौदा बनाने के लिए खर्च जान बूझकर बढ़ाया जा रहा है। इस विदेशी प्रयास में स्वदेशी, सरलचित वैज्ञानिकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

रासायनिक खेती से घटती उपज के प्रमाण

हमने जितने किसानों से बात की, सबका कहना है कि आज से 20 साल पहले उपज आज से अधिक होती थी। तब प्रति बीघा 50 रु. से 100 रु. का खर्च भी नहीं होता था और आज हजारों रु. प्रति बीघा खर्च हो रहा है। एक किसान ने बतलाया कि 15-20 साल पहले उनके खेतों में 20-22 बोरी मक्की होती थी जो रासायनिक खेती से घटकर अब 9-10 बोरी रह गई है, खर्चे कई गुणा बढ़ गए हैं।

‘भारत स्वाभिमान’ के राष्टीय महामंत्री राजीव दीक्षित जी के अनुसार हज़ारों किसान जैविक खेती से प्रति एकड़ 56 क्विंटल तक धान उगा रहे हैं। इसी प्रकार गेंहूं भी 22 क्विंटल या इससे अधिक उगाई जा रही है। बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए रासायनिक खेती की जरूरत की वकालत एक आधार हीन, तथ्यों से रहित बात है। हम विदेशी प्रचार के प्रभाव में इस झूठ को सच माने हुए हैं। जरा अपनी आंखों से सच को समझना पडे़गा।

किसान विरोधी है भूमि अधिग्रहण अधिनियम

किसान विरोधी है भूमि अधिग्रहण अधिनियम

आजादी के 62 वर्षों बाद भी भारत का आम नागरिक,मजदूर-किसान अपने ही नेतृत्व तथा अपने ही द्वारा चुनी गई सरकारों के मनमाने पूर्ण रवैये का शिकार होकर बद से बदतर स्थिति में जीने को विवश है।विकास की अंधाधुंध दौड़ में किसानों की भूमि को अधिग्रहीत करके उन्हें भूमिहीन बनाने व पूंजीवाद का शिकार बनाने में कोई कोताही नहीं बरती जा रही है।राष्टपिता महात्मा गाँधी के सत्याग्रह आन्दोलन से ब्रितानिया हुकूमत की नींद हराम हो गई थी,क्रान्तिकारी विचारधारा के वाहकों ने भारत माता की गुलामी की बेडियां काटने में अपना सर्वस्व न्यौछावर किया।भारत-भूमि ब्रितानिया हुकूमत से,साम्राज्यवादी सोच से आजाद तो हो गई परन्तु अफसोस अंग्रेज परस्त काले-भूरे शासकों ने भारत के आम जनों का शोषण-उत्पीड़न बदस्तूर जारी रखा है।आम जन आज भी नौकरशाही के चक्रव्यूह में फंसा हुआ अपना दम तोड़ने को विवश है।भ्रष्टाचार को जीवन का अनिवार्य-आवश्यक अंग बना चुके तमाम नेताओं-नौकरशाहों ने जन विरोधी कृत्यों को करना बदस्तूर जारी रखा है। उ0प्र0 की राजधानी लखनउ से सटे जनपद बाराबंकी की तहसील फतेहपुर के पचघरा में उपमण्डी स्थल निर्माण के लिए किसानों की बेशकीमती उपजाउ कृषि भूमि का मनमाना अधिग्रहण आम जन विरोधी,किसान हित विरोधी सोच का ज्वलंत उदाहरण है।किसान जिस संगठन से जुडे रहे उसके नेतृत्व ने ही उनका साथ छोड़ दिया,उनके साथ विश्वासघात किया,प्रशासन के पैरोकार बनकर किसानों के धरने को बिना उनकी सहमति के खत्म करने की घोषणा कर दी।लेकिन किसान अब भी अपनी कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण के विरोध में सत्याग्रह कर रहे। है।।अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए पचघरा के किसानों ने अब अपने खेत पर धरना देते रहने के बजाए विभिन्न संगठनों से सम्पर्क कर के संघर्ष में सहयोग मांगा है।भूमि अधिग्रहण से पीड़ित किसान अब अपने गाँव ,खेत,खलिहान से अपने हक को वापस लेने के लिए निकल पड़े हैं।नेतृत्व के छल व नौकरशाही के मनमाने पूर्ण रवैये के शिकार पचघरा के पीड़ित किसानों के दिलों में गुबार भरा है।अपनी ही भूमि पर सरकारी कब्जे की आशंका से ये किसान आक्रोशित है।।इन बेबस,छल के शिकार किसानों के दिलो-दिमाग में आग सुलग रही है।किसानों के इस संघर्ष मे। जनपद के तमाम किसान नेताओं व संगठनों ने अपना समर्थन दे दिया है।पचघरा के किसानों के द्वारा लड़ी जा रही हक की लड़ाई जन-संघर्ष में बदलती जा रही है। युग दृष्टा सरदार भगत सिंह जिन मजदूरों-किसानों को भारत की,क्रान्ति की वास्तविक शक्ति मानते थे,जिनकी तरक्की से ही वो भारत की तरक्की की कल्पना करते थे,आज वो मजदूर-किसान अपने हक से वंचित हैं।विभिन्न सरकारी योजनाओं के लिए मनमाने पूर्ण तरीके से अन्नदाता की जमीनों का अधिग्रहण करके विकास के नाम पर गरीब किसानों की आजादी पर,उनके अधिकारों पर हमला बोलना जारी है।यह हमारा अपना दुर्भाग्य है कि जो कानून ब्रितानिया हुकूमत ने वर्ष 1894 में ‘‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम,1894‘‘पारित किया था,वर्ष 1947 में आजादी मिलने के बाद भी भारत सरकार ने किसान हित विरोधी इसी भूमि अधिग्रहण अधिनियम,1894 को अंगीकार किया।भारत की ग्राम्य व्यवस्था को खस्ताहाल करने के घृणित उद्देश्य से बनाये गये इस भूमि अधिग्रहण अधिनियम,1894 में आजादी के बाद कुछ संशोधन भी किये गये परन्तु किसानों की भूमि का मुआवजा निर्धारण की प्रक्रिया वही बनी रही।ब्रितानिया हुकूमत का यह काला कानून आज भी अन्नदाता की छाती पर मूंग दरने का कार्य कर रहा है।मुआवजे के निर्धारण के तौर-तरीके,मापदण्ड़ तथा प्रशासनिक कार्यशैली अब तो ब्रितानिया हुकूमत को भी मात देने लगी है।किसान अपनी भूमि नहीं देना चाहते हैं तो भी सार्वजनिक उद्देश्य व विकास के नाम पर कृषि भूमि का अधिग्रहण लोकतन्त्र को भयावह राह पर ले जाने वाला साबित होगा।आज किसानों की भूमि तरक्की व विकास का वास्ता देकर हड़पने की साजिश को समझने की जरूरत है। कृषि योग्य उपजाउ भूमि पर उपमण्ड़ी स्थल निर्माण से विकास का दावा करने वालों को यह समझना होगा कि यदि किसानों की भूमि मनमाने तरीके से शासन सत्ता के बल व नेतृत्व द्वारा विश्वासघात के कारण ले ली जाती है,तो वर्तमान शासकीय व्यवस्था के खिलाफ इनके मन में जो बीज रोपित हो गया है,वो कालांतर में कितना बड़ा वट वृक्ष बनेगा।किसी तरह मेहनत मशक्कत करके,कड़ी दोपहरी में,भीषण सर्दी व बरसात में सपरिवार अपने परिवार व समाज का उदर-पोषण करने वाले इन गरीब,बेबस पचघरा के किसानों के जीवन स्तर को यदि सरकारें सुधार नहीं सकती तो इनसे इनकी अपनी भूमि जबरन अधिग्रहीत करने का हक भी सरकारों को नहीं है।पीड़ित किसानों ने अपना संगठन ‘‘पचघरा भूमि अधिग्रहण विरोधी मोर्चा‘‘ गठित करके अपने हक एवं जनअधिकारों की रक्षा का संकल्प ले लिया है।

किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह का साफ कहना था कि,‘‘देश की तरक्की का रास्ता खेत व खलिहान से होकर गुजरता है।‘‘आज किसानों के खेत पर सरकारों की कुदृष्टि पड़ चुकी है।बंजर जमीन को कृषि योग्य बनाने के नाम पर लाखों नहीं करोंड़ों व्यय करने वाली सरकारें कंक्रीट के जंगल को तैयार करने के लिए कृषि भूमि का चयन करके जनता के पैसों की बर्बादी कर रहीं हैं।विकास के नाम पर बनने वाली इमारतों का निर्माण बंजर भूमि पर,सरकारी भूमि पर होना चाहिए।दबंगों व भूमाफियाओं के कब्जे की सरकारी जमीन पर कब्जा लेने में नाकाम प्रशासन अपनी सारी ताकत पूरे देश-समाज का उदर पोषण करने वाले अन्नदाता किसानों को धमकाने-लठियाने व ऐन केन प्रकारेण उनकी भूमि पर इमारतों को बनाने में लगा देता है।विकास के धन की लूट व बन्दरबाट के फेर में देश को ज्वालामुखी के मुहाने पर ले जाने का कार्य भ्रष्टाचार में लिप्त शासन के जिम्मेदारों द्वारा किया जा रहा है।सादगी की प्रतिमूर्ति,ईमानदारी के प्रतीक लाल बहादुर शास्त्री ने देश की सीमा पर तैनात जवान और मेहनतकश किसान के सम्मान में ही ‘‘जय जवान-जय किसान‘‘ का उदघोष किया था।औद्योगीकरण के भयावह खतरों को समझते हुए ही महात्मा गाँधी स्वदेशी,स्वावलम्बन व पुरातन ग्राम्य संरचना की स्थापना पर बल देते थे।डा0 राममनोहर लोहिया ने समाजवादी परिवर्तन को सफल बनाने के लिए जेल,वोट और फावड़ा,इन तीन संघर्षों पर विशेष बल दिया था।डा0 लोहिया की सोच जेल,वोट और फावड़े में फावड़े का मूल अर्थ समाज के आखिरी आदमी के चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक पैदा करना है।समस्त संघर्ष के आक्रोश को रचनात्मक उत्सर्ग के लिए तत्पर रहने की इच्छा शक्ति पैदा करना अनिवार्य मानते थे-डा0 लोहिया। गाँधी के सच्चे अनुयायी डा0लोहिया तात्कालिक अन्याय का पुरजोर विरोध करते थे और चाहते थे कि उनके लोग भी करे।।आज पचघरा के इन संघर्षरत् किसानों के साथ हो रहे अन्याय,उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष की अगुआई करने यदि डा0लोहिया जीवित होते तो अब तक पहुँच गये होते।आज पचघरा के किसान डा0लोहिया के सिद्धान्त को मानते हुए अन्याय के खिलाफ प्रतिकार कर रहें हैं। लोहिया के लोगों को खामोशी तोड़कर भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष करना चाहिए।

लोक कल्याण के नाम पर

लोक कल्याण के नाम पर

पश्चिमी प्रभाव में हमने सीखना शुरू कर दिया है कि कण्डोम साथ लेकर चलो ताकि एड्स से बचाव हो। सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे अश्लील विज्ञापन देखने को मिल जाते हैं कि कण्डोम साथ लेकर चलो। क्या मायने हैं इसके ? भारतीयों की ऐसी पतित सोच तो कभी नहीं रही, पर हमें ऐसा बनाने का एक सोचा-समझा प्रयास चलता नज़र आ रहा है।

पश्चिमी जगत के लोग हर पल काम वासना पूर्ति के लिए मल-मूत्र त्याग से अधिक तत्परता से , कभी भी, कहीं भी की तरह तैयार रहते है। पर क्या भारत की ऐसी दुर्दषा कभी रही हैं? नहीं रही, इसीलिए हमारी ऐसी दुर्गति करने की योजनाएं और तैयारी करोड़ों नहीं अरबों रु खर्च करके देश भर में प्रारम्भ की गई है, और वह भी हमारे कल्याण के नाम पर। ये विनाशकारी योजनाएं एड्स के बचाव के नाम पर लागू की जा रही हैं। स्वदेशी-विदेशी स्वयंसेवी संस्थाएं इस कार्य को करने के लिए सरकारी खजाने और विदेशी सहायता से भारी भरकम अनुदान प्राप्त करती रही हैं।

यानी एड्स से बचाव के नाम पर हर बच्चे बूढ़े को हर पल काम वासना के सागर में गिराने का, पश्चिम के षड्यंत्र को लागू करने का काम सरकारी संरक्षण में खूब फल-फूल रहा है। चरित्र, संयम के स्वभाव में विकसित भारतीय समाज, विदेशी आकाओं की भावी योजनाओं में बाधक है। अतः उसे समाप्त करने का कुटिल प्रयास व्यापक स्तर पर सफलता पूर्वक चल रहा है। आपको कोई ऐतराज तो नहीं कि आप और आपके बेटे-बेटियाँ, बहुएं अपने साथ कण्डोम लेकर चलें? कृपया शर्म के कारण इस पर मौन रहकर सहयोगी न बनें। लाखों साल से संयम और चरित्र की प्रतिष्ठा को प्राप्त समाज की होने वाली इस दुर्दशा और विनाश के प्रयासों को हम और खुलकर अपना मत प्रकट करें।

भारतीय समाज की व्यवस्थाओं को तोड़ने वाले पूरी बेशर्मी से बात को कहते और प्रचार करते हैं और हम अपने संस्कारों से बंधे चुप-चाप सब सह जाते हैं। यह सब यूं ही चलने देना आने वाले विनाश की भूमिका बना रहा है। इसमें आपका मौन सहायक हो रहा है। अतः इस पर सोचें, इसे हम और जो उचित लगे वह कहें, पर कुछ करें जरूर। याद रखें कि मनुष्य की हर जरूरत से धन कमाना और उसके लिये उन्हें अति की सीमा तक भोगों को भोगने के लिए उकसाना, हमें पतन और विनाश की खाई में धकेलने वाला है।

‘कंण्डोम साथ लेकर चलने’ जैसे विज्ञापन देखकर सर -झुककर गुज़र जाने से काम नहीं चलेगा। बच्चों और युवाओं के कोमल मन को विकृत बनाने पाले इन कुप्रयासों का विरोध दर्ज करवाना एक बार शुरू तो करें, आप जैसे कइ लाग होंगे जो आपके साथ़ जुड़जाएंगे।

अन्यथा पूरी संस्कृति पतन के खाइ में गिरकर समाप्त होती जाएगी।

स्वदेशी, विदेशी गौवंश का अन्तर

स्वदेशी, विदेशी गौवंश का अन्तर

विदेशी गौवंश ‘ए-1’

अनेक खोजो से साबित हुआ है कि अधिकांश विदेशी गौवंश विषाक्त है। आॅकलैण्ड की ‘ए-2, कार्पोरेशन तथा प्रसिद्ध खोजी विद्वान ‘डा. कोरिन लेक् मैकने’ की खोजों के अनुसार ‘ए-1’ प्रकार की गौ के दूध में ‘बीटा कैसीन ए-1, पाया गया है जिससे हमारे शरीर में ‘आई जी एफ-१, इन्सुलिन ग्रोथ हार्मोन-१० तरह अधिक निर्माण होने लगता है। यह पहले ही बताया जा चुका है कि ‘आई जीएफ-1’ से कई प्रकार के कैंसर होने के प्रमाण मिल चुके हैं।

इसके ईलावा-

‘ हैल्थ जनरल’ न्यूजीलैण्ड के अनुसार ‘ए-1’ दूध से हृदय रोग मानसिक रोग, मधुमेह, गठिया, आॅटिज्म (शरीर के अंगो पर नियंत्रण न रहना) आदि रोग होते हैं। सन् 2003 में ‘ए-2’ ‘कार्पोरेशन’ द्वारा किए सर्वेक्षण से पता चला है कि इन गऊओं के दूध् से स्वीडन, यूके, आस्ट्रेलिया, न्यूजिलेंड में हृदय रोग, मधुमेह रोगों में वृद्धि हुई है। फ्रांस तथा जापान में ‘ए-2’ दूध् से इन रोगों में कमी दर्ज की गई है। प्रशन है कि हानिकारक ‘ए-1’ तथा लाभदायक ए-2 दूध् किन गऊओं में है ?

पश्चिमी वैज्ञानिकों के अनुसार ७०% हालिस्टीन, रेड डैनिश और फ्रिजियन गऊएं हानिकारक ‘ए-1’ प्रोटीन वाली है। जर्सी की अनेक जातियां भी इसी प्रकार की है। पर यह स्पष्ट रूप से कोई नहीं बतला रहा कि लाभदायक ‘ए-2’ प्रोटीन वाली गऊएं कौन सी है, कहां है स्वयं जरा ढूंढ़ें। विचार करें!!

ब्राजील में लगभग 40 लाख भारतीय गौवंश तैयार किया गया हैं और पूरे यूरोप में उसका निर्यात हो रहा है।

इनमें अधिकांश गऊएं भारतीय गीर नस्ल और शेष रैड सिंधी तथा सहिवाल हैं। क्या अब बताने की जरूरत है पड़ेगा कि उपयोगी ‘ए-2’ प्रोटीन वाली गऊएं भारतीय है ?

क्या पशुपालन विभाग का दुरूपयोग करके, करोड़ रु. अनुदान देकर, पशु कल्याण के नाम पर भारतीय गौवंश को नष्ट करने की गुप्त योजना पश्चिमी ताकतें चला रही हैं. भोले भारतीयों को उनका आभास तक नहीं है। दूध् बढ़ाने और वंश सुधार के नाम पर भारतीय गौवंश का बीज नाश ‘कृत्रिम गर्भाधन’ करके कत्लखानों से कई गुणा अधिक भारतीय गौवंश का विनाश आपकी सहमति, सहयोग से, आपके अपने द्वारा हो रह है। गौवंश विनाश यानी भारत का विनाश। धन व्यय करके कृत्रिम गर्भाधन से अपने अमूल्य ‘ए-2’ गौवंश को हम स्वयं नष्ट कर रहें हैं।

विषाक्त विदेशी गौवंश से बने संकर भारतीय गौवंश से प्राप्त किया घी, दूध्, दही ही नही, गोबर, गौमुत्रा, स्पर्श और निश्वास भी विषाक्त होगा न? दुग्ध् पदार्थो से हमारा स्वास्थ्य बरबाद नही हो रहा क्या? इनके गोबर, गौमूत्रा से बनी खाद और पंचगव्य औषधिया भी परम हानिकारक प्रभाव वाली होगी। हमारी खेती नष्ट होने, पंचगव्य औषधियों के असफल होने, घी, दूध्, दहीं खाने-पीने पर भी स्वास्थय में सुधार होने की बजाए बिगाड़ का बड़ा कारण यह संकर गौवंश हो सकता है।

समाधान सरल है:

वर्तमान संकर नसल का गौवंश ‘ए-1’ तथा ‘ए-2’ के संयुक्त गुणों वाला है। इनमें ५०% से ६०% दोनो गुण हों तो स्वदेशी गर्भधन की व्यवस्था से अगली पीढ़ी में ‘ए-1’ २५% दूसरी बार १२% तथा तीसरी बार ६% रह जाएगा। बिगाड़ने वालों ने सन् 1700 से आज तक 300 साल धैर्य से काम किया, हम 10-12 साल प्रयास क्यों नही कर सकते? करने में काफी सरल है।

स्वदेशी विदेशी का अन्तर- विदेशी गौवंश तथा भारतीय गौवंश में कुछ मौलिक अंतर हमने जो जाने हैं वे निम्न है। पर यह सूचि अन्तिम नही, विद्वान और अनुभवी महानुभव इसमें संशोधन-संर्वधन करने की कृपा करें|

शनिवार, 25 सितंबर 2010

ओबामा चले स्वदेशी की राह - हम कब फिर से चलेंगे?

ओबामा चले स्वदेशी की राह - हम कब फिर से चलेंगे?
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा अमरीकियों से कह रहे हैं कि वे अब अमेरिकी उत्पाद ही खरीदें, क्योंकि मुल्क मंदी की गिरफ़्त में है। उनके कहने का मतलब है कि अगर अमरीकी विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करेंगे तो देशी उत्पादन की खपत बढ़ेगी और ज़ाहिर है इससे देशी कंपनियाँ मंदी से उबरेंगी। स्वदेशी की इस भावना से रोज़गार की संभावनाएं भी बढ़ जाएंगी।
अब मज़े की बात ये है कि अभी तक यही अमेरिका और उसके इशारे पर दुनिया को चलाने वाले विश्वबैंक तथा मुद्रा कोष स्वदेशी को भूमंडलीकरण और खुली आर्थिक नीतियों के विरूद्ध मानते थे। विरुद्ध ही नहींमानते थे बल्कि सभी तरह की रोक-टोक हटाने के लिए तरह-तरह से बाहें भी मरोड़ते थे। उन्हीं की देखादेखी मनमोहन मंडली भी स्वदेशी को समाप्त करके विदेशी को बढ़ावा देने लगी थी। आत्मनिर्भरता का प्रश्न उनके लिए उपहास की चीज़ बन गया था क्योंकि उन्होंने उस भूमंडलीकृत दुनिया में जीना शुरू कर दिया था जो कि अभी बनी ही नहीं थी। इसीलिए उसने विदेशी वस्तुओं के लिए सारे दरवाज़े उसने खोल दिए थे और उन पर लगने वाले तमाम तरह के शुल्क भी बहुत कम या ख़त्म कर दिए थे। नतीजा ये हुआ कि हमारे बाज़ार विदेशी वस्तुओं से पट गए। फारेन मेड के दीवाने हम भारतीय उनपर टूट पड़े और हमारे उद्योग चरमराने लगे।
ओबामा के स्वदेशी मंत्रजाप से पता चलता है कि एक झटके ने ही अमेरिका को सिर के बल खड़ा कर दिया है। अब वह अपने उद्योग-धंधों को बचाने के लिए तरह-तरह के प्रतिबंध लगाने की बात करने लगा है। अब उसे चिंता नहीं है कि दुनिया भर में व्यापार में रुकावटें नहीं होनी चाहिए। मुश्किल ये है कि जो मुल्क उसकी मर्ज़ी पर चल रहे थे अब वे फँस गए हैं जैसे कि भारत। भारत की बहुत सी कंपनियों ने खुद को निर्यात पर निर्भर कर लिया था, अब वे डूबेंगी, जिसका अर्थ है मंदी की दोहरी मार। बेरोज़गारी और फैलेगी सो अलग।
इसीलिए जी-20 की बैठक मे हिस्सा लेने पहुँचे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गुहार लगाई की बड़े मुल्क संरक्षणवादी रवैया न अपनाएं। अब मनमोहन सिंह को कौन समझाए कि ये मुल्क अपना मतलब देखते हैं। इन्होंने न तो पहले छोटे मुल्कों की कभी सुनी है और न अब सुननेवाले हैं। वे तो पहले अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाएंगे चाहे इससे आपका दीवाला ही क्यों न निकल जाए। ओबामा के स्वदेशी हमले का जवाब तो हमारा स्वदेशी ही हो सकता है। बेहतर तो यही होगा कि भारत भी विदेशी कंपनियों के लिए दरवाज़े बंद करे और देशी कंपनियों को संरक्षण प्रदान करे।

अनुसरणकर्ता